॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.16.14
तवैव मारीच मनःशरीरजाः
प्रजा इमाः सत्त्वरजस्तमोजुषः।
समो भवांस्तास्वसुरादिषु प्रभो
तथापि भक्तं भजते महेश्वरः॥ १४
tavaiva mārīca manaḥśarīrajāḥ
prajā imāḥ sattvarajastamojuṣaḥ|
samo bhavāṃstāsvasurādiṣu prabho
tathāpi bhaktaṃ bhajate maheśvaraḥ|| 14
अर्थ
आर्यपुत्र! समस्त प्रजा—वह चाहे सत्त्वगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी हो—आपकी ही सन्तान है। कुछ आपके संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं और कुछ शरीरसे। भगवन्! इसमें सन्देह नहीं कि आप सब सन्तानोंके प्रति—चाहे असुर हों या देवता—एक-सा भाव रखते हैं, सम हैं। तथापि स्वयं परमेश्वर भी अपने भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण किया करते हैं॥ १४॥