मेरे स्वामी! मैं आपकी दासी हूँ। आप मेरी भलाईके सम्बन्धमें विचार कीजिये। मर्यादापालक प्रभो! शत्रुओंने हमारी सम्पत्ति और रहनेका स्थानतक छीन लिया है। आप हमारी रक्षा कीजिये॥ १५॥
तस्मादीश भजन्त्या मे श्रेयश्चिन्तय सुव्रत।
हृतश्रियो हृतस्थानान्सपत्नैः पाहि नः प्रभो॥ १५
मेरे स्वामी! मैं आपकी दासी हूँ। आप मेरी भलाईके सम्बन्धमें विचार कीजिये। मर्यादापालक प्रभो! शत्रुओंने हमारी सम्पत्ति और रहनेका स्थानतक छीन लिया है। आप हमारी रक्षा कीजिये॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 980) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/16/15/