श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अदितिरुवाच

केनाहं विधिना ब्रह्मन्‍नुपस्थास्ये जगत्पतिम्।

यथा मे सत्यसङ्कल्पो विदध्यात् स मनोरथम्॥ २२

kenāhaṃ vidhinā brahmannupasthāsye jagatpatim|

yathā me satyasaṅkalpo vidadhyāt sa manoratham|| 22

अर्थ

अदितिने पूछा—भगवन्! मैं जगदीश्‍वरभगवान्‌की आराधना किस प्रकार करूँ, जिससे वे सत्यसंकल्प प्रभु मेरा मनोरथ पूर्ण करें॥ २२॥✎ 750

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #750 शब्दोंके बीचका स्थान: जगदीश्‍वरभगवान् की → जगदीश्‍वरभगवान्‌की

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