(और इस प्रकार स्तुति करे—) ‘प्रभो! आप सर्वशक्तिमान् हैं। अन्तर्यामी और आराधनीय हैं। समस्त प्राणी आपमें और आप समस्त प्राणियोंमें निवास करते हैं। इसीसे आपको ‘वासुदेव’ कहते हैं। आप समस्त चराचर जगत् और उसके कारणके भी साक्षी हैं। भगवन्! मेरा आपको नमस्कार है॥ २९॥✎ 752753
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महीयसे।
सर्वभूतनिवासाय वासुदेवाय साक्षिणे॥ २९
(और इस प्रकार स्तुति करे—) ‘प्रभो! आप सर्वशक्तिमान् हैं। अन्तर्यामी और आराधनीय हैं। समस्त प्राणी आपमें और आप समस्त प्राणियोंमें निवास करते हैं। इसीसे आपको ‘वासुदेव’ कहते हैं। आप समस्त चराचर जगत् और उसके कारणके भी साक्षी हैं। भगवन्! मेरा आपको नमस्कार है॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 981) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)