श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.30

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नमोऽव्यक्ताय सूक्ष्माय प्रधानपुरुषाय च।

चतुर्विंशद‍्गुणज्ञाय गुणसंख्यानहेतवे॥ ३०

namo'vyaktāya sūkṣmāya pradhānapuruṣāya ca|

caturviṃśadguṇajñāya guṇasaṃkhyānahetave|| 30

अर्थ

आप अव्यक्त और सूक्ष्म हैं। प्रकृति और पुरुषके रूपमें भी आप ही स्थित हैं। आप चौबीस गुणोंके जाननेवाले और गुणोंकी संख्या करनेवाले सांख्यशास्त्रके प्रवर्तक हैं। आपको मेरा नमस्कार है॥ ३०॥✎ 752 753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #752 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #753 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्‌ने

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