भगवान्की पूजामें आदर-बुद्धि रखते हुए केवल पयोव्रती रहकर यह व्रत करना चाहिये। पूर्ववत् प्रतिदिन हवन और ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिये॥ ४६॥✎ 758
पयोभक्षो व्रतमिदं चरेद् विष्ण्वर्चनादृतः।
पूर्ववज्जुहुयादग्निं ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत्॥ ४६
भगवान्की पूजामें आदर-बुद्धि रखते हुए केवल पयोव्रती रहकर यह व्रत करना चाहिये। पूर्ववत् प्रतिदिन हवन और ब्राह्मण भोजन भी कराना चाहिये॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 983) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/16/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)