इस प्रकार पयोव्रती रहकर बारह दिनतक प्रतिदिन भगवान्की आराधना, होम और पूजा करे तथा ब्राह्मण-भोजन कराता रहे॥ ४७॥✎ 759
एवं त्वहरहः कुर्याद् द्वादशाहं पयोव्रतः।
हरेराराधनं होममर्हणं द्विजतर्पणम्॥ ४७
इस प्रकार पयोव्रती रहकर बारह दिनतक प्रतिदिन भगवान्की आराधना, होम और पूजा करे तथा ब्राह्मण-भोजन कराता रहे॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 983) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/16/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)