श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अपि वाकुशलं किञ्चिद् गृहेषु गृहमेधिनि।

धर्मस्यार्थस्य कामस्य यत्र योगो ह्ययोगिनाम्॥ ५

api vākuśalaṃ kiñcid gṛheṣu gṛhamedhini|

dharmasyārthasya kāmasya yatra yogo hyayoginām|| 5

अर्थ

प्रिये! गृहस्थाश्रम तो, जो लोग योग नहीं कर सकते, उन्हें भी योगका फल देनेवाला है। इस गृहस्थाश्रममें रहकर धर्म, अर्थ और कामके सेवनमें किसी प्रकारका विघ्न तो नहीं हो रहा है?॥ ५॥

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