श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.54

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

भोजयेत् तान् गुणवता सदन्‍नेन शुचिस्मिते।

अन्यांश्‍च ब्राह्मणाञ्छक्‍त्या१ ये च तत्र समागताः॥ ५४

bhojayet tān guṇavatā sadannena śucismite|

anyāṃśca brāhmaṇāñchaktyā ye ca tatra samāgatāḥ|| 54

अर्थ

प्रिये! आचार्य और ऋत्विजोंको शुद्ध, सात्त्विक और गुणयुक्त भोजन कराना ही चाहिये; दूसरे ब्राह्मण और आये हुए अतिथियोंको भी अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराना चाहिये॥ ५४॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मुक्तान्।

    (मुद्रित पृष्ठ 984)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें