अन्यांश्च ब्राह्मणाञ्छक्त्या१ ये च तत्र समागताः॥ ५४
bhojayet tān guṇavatā sadannena śucismite|
anyāṃśca brāhmaṇāñchaktyā ye ca tatra samāgatāḥ|| 54
अर्थ
प्रिये! आचार्य और ऋत्विजोंको शुद्ध, सात्त्विक और गुणयुक्त भोजन कराना ही चाहिये; दूसरे ब्राह्मण और आये हुए अतिथियोंको भी अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराना चाहिये॥ ५४॥
भोजयेत् तान् गुणवता सदन्नेन शुचिस्मिते।
अन्यांश्च ब्राह्मणाञ्छक्त्या ये च तत्र समागताः॥ ५४
प्रिये! आचार्य और ऋत्विजोंको शुद्ध, सात्त्विक और गुणयुक्त भोजन कराना ही चाहिये; दूसरे ब्राह्मण और आये हुए अतिथियोंको भी अपनी शक्तिके अनुसार भोजन कराना चाहिये॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 984) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/16/54/