श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.55

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

दक्षिणां गुरवे दद्यादृत्विग्भ्यश्‍च यथार्हतः।

अन्‍नाद्येनाश्‍वपाकांश्‍च प्रीणयेत्समुपागतान्॥ ५५

dakṣiṇāṃ gurave dadyādṛtvigbhyaśca yathārhataḥ|

annādyenāśvapākāṃśca prīṇayetsamupāgatān|| 55

अर्थ

गुरु और ऋत्विजोंको यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये। जो चाण्डाल आदि अपने-आप वहाँ आ गये हों, उन सभीको तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषोंको भी अन्‍न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कारको भगवान्‌की प्रसन्‍नताका साधन समझते हुए अपने भाई-बन्धुओंके साथ स्वयं भोजन करे॥ ५५-५६॥✎ 764

यह अर्थ श्लोक 55–56 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #764 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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