श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.60

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अयं वै सर्वयज्ञाख्यः सर्वव्रतमिति स्मृतम्।

तपःसारमिदं भद्रे दानं चेश्‍वरतर्पणम्॥ ६०

ayaṃ vai sarvayajñākhyaḥ sarvavratamiti smṛtam|

tapaḥsāramidaṃ bhadre dānaṃ ceśvaratarpaṇam|| 60

अर्थ

कल्याणी! यह व्रत भगवान्‌को सन्तुष्ट करनेवाला है, इसलिये इसका नाम है ‘सर्वयज्ञ’ और ‘सर्वव्रत’। यह समस्त तपस्याओंका सार और मुख्य दान है॥ ६०॥✎ 768 1623

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #768 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #1623 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाला → करनेवाला

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