श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.61

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

त एव नियमाः साक्षात्त एव च यमोत्तमाः।

तपो दानं व्रतं यज्ञो येन तुष्यत्यधोक्षजः॥ ६१

ta eva niyamāḥ sākṣātta eva ca yamottamāḥ|

tapo dānaṃ vrataṃ yajño yena tuṣyatyadhokṣajaḥ|| 61

अर्थ

जिनसे भगवान् प्रसन्‍न हों—वे ही सच्चे नियम हैं, वे ही उत्तम यम हैं, वे ही वास्तवमें तपस्या, दान, व्रत और यज्ञ हैं॥ ६१॥

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