जिन घरोंमें आये हुए अतिथिका जलसे भी सत्कार नहीं किया जाता और वे ऐसे ही लौट जाते हैं, वे घर अवश्य ही गीदड़ोंके घरके समान हैं॥ ७॥
गृहेषु येष्वतिथयो नार्चिताः सलिलैरपि।
यदि निर्यान्ति ते नूनं फेरुराजगृहोपमाः॥ ७
जिन घरोंमें आये हुए अतिथिका जलसे भी सत्कार नहीं किया जाता और वे ऐसे ही लौट जाते हैं, वे घर अवश्य ही गीदड़ोंके घरके समान हैं॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 979) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/16/7/