प्रिये! सम्भव है, मेरे बाहर चले जानेपर कभी तुम्हारा चित्त उद्विग्न रहा हो और समयपर तुमने हविष्यसे अग्नियोंमें हवन न किया हो॥ ८॥
अप्यग्नयस्तु वेलायां न हुता हविषा सति।
त्वयोद्विग्नधिया भद्रे प्रोषिते मयि कर्हिचित्॥ ८
प्रिये! सम्भव है, मेरे बाहर चले जानेपर कभी तुम्हारा चित्त उद्विग्न रहा हो और समयपर तुमने हविष्यसे अग्नियोंमें हवन न किया हो॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.16.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 979) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/16/8/