देवि! देखो, किसीके पूछनेपर भी यह बात दूसरेको मत बतलाना। देवताओंका रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है॥ २०॥✎ 1951
नैतत् परस्मा आख्येयं पृष्टयापि कथञ्चन।
सर्वं सम्पद्यते देवि देवगुह्यं सुसंवृतम्॥ २०
देवि! देखो, किसीके पूछनेपर भी यह बात दूसरेको मत बतलाना। देवताओंका रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.17.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 987) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/17/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1951 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्थति → स्थित