श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.17.20

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नैतत् परस्मा आख्येयं पृष्टयापि कथञ्चन।

सर्वं सम्पद्यते देवि देवगुह्यं सुसंवृतम्॥ २०

naitat parasmā ākhyeyaṃ pṛṣṭayāpi kathañcana|

sarvaṃ sampadyate devi devaguhyaṃ susaṃvṛtam|| 20

अर्थ

देवि! देखो, किसीके पूछनेपर भी यह बात दूसरेको मत बतलाना। देवताओंका रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है॥ २०॥✎ 1951

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1951 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्थति → स्थित

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