॥ श्रीहरिः ॥
कमण्डलुं वेदगर्भः कुशान्सप्तर्षयो ददुः।
अक्षमालां महाराज सरस्वत्यव्ययात्मनः॥ १६
kamaṇḍaluṃ vedagarbhaḥ kuśānsaptarṣayo daduḥ|
akṣamālāṃ mahārāja sarasvatyavyayātmanaḥ|| 16
अर्थ
परीक्षित्! अविनाशी प्रभुको ब्रह्माजीने कमण्डलु, सप्तर्षियोंने कुश और सरस्वतीने रुद्राक्षकी माला समर्पित की॥ १६॥✎ 782 783 1626
कमण्डलुं वेदगर्भः कुशान्सप्तर्षयो ददुः।
अक्षमालां महाराज सरस्वत्यव्ययात्मनः॥ १६
परीक्षित्! अविनाशी प्रभुको ब्रह्माजीने कमण्डलु, सप्तर्षियोंने कुश और सरस्वतीने रुद्राक्षकी माला समर्पित की॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 990) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/18/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #782 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #783 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #1626 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्का → वामनभगवान्का