॥ श्रीहरिः ॥
ददौ कृष्णाजिनं भूमिर्दण्डं सोमो वनस्पतिः।
कौपीनाच्छादनं माता द्यौश्छत्रं जगतः पतेः॥ १५
dadau kṛṣṇājinaṃ bhūmirdaṇḍaṃ somo vanaspatiḥ|
kaupīnācchādanaṃ mātā dyauśchatraṃ jagataḥ pateḥ|| 15
अर्थ
पृथ्वीने कृष्णमृगका चर्म, वनके स्वामी चन्द्रमाने दण्ड, माता अदितिने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाशके अभिमानी देवताने वामनवेषधारी भगवान्को छत्र दिया॥ १५॥✎ 782 783 1626
ददौ कृष्णाजिनं भूमिर्दण्डं सोमो वनस्पतिः।
कौपीनाच्छादनं माता द्यौश्छत्रं जगतः पतेः॥ १५
पृथ्वीने कृष्णमृगका चर्म, वनके स्वामी चन्द्रमाने दण्ड, माता अदितिने कौपीन और कटिवस्त्र एवं आकाशके अभिमानी देवताने वामनवेषधारी भगवान्को छत्र दिया॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 990) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #782 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #783 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #1626 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्का → वामनभगवान्का