परीक्षित्! वामनभगवान्के तेजसे ऋत्विज्, यजमान और सदस्य—सब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखनेके लिये सूर्य, अग्नि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं॥ २२॥✎ 786787788789
त ऋत्विजो यजमानः सदस्या
हतत्विषो वामनतेजसा नृप।
सूर्यः किलायात्युत वा विभावसुः
सनत्कुमारोऽथ दिदृक्षया क्रतोः॥ २२
परीक्षित्! वामनभगवान्के तेजसे ऋत्विज्, यजमान और सदस्य—सब-के-सब निस्तेज हो गये। वे लोग सोचने लगे कि कहीं यज्ञ देखनेके लिये सूर्य, अग्नि अथवा सनत्कुमार तो नहीं आ रहे हैं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 991) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/18/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्को