भृगुके पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्योंके साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथमें छत्र, दण्ड और जलसे भरा कमण्डलु लिये हुए वामनभगवान्ने अश्वमेध यज्ञके मण्डपमें प्रवेश किया॥ २३॥✎ 786787788789
इत्थं सशिष्येषु भृगुष्वनेकधा
वितर्क्यमाणो भगवान्स वामनः।
छत्रं सदण्डं सजलं कमण्डलुं
विवेश बिभ्रद्धयमेधवाटम्॥ २३
भृगुके पुत्र शुक्राचार्य आदि अपने शिष्योंके साथ इसी प्रकार अनेकों कल्पनाएँ कर रहे थे। उसी समय हाथमें छत्र, दण्ड और जलसे भरा कमण्डलु लिये हुए वामनभगवान्ने अश्वमेध यज्ञके मण्डपमें प्रवेश किया॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.18.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 991) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/18/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#786 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्को