भगवान् वामनका बलिसे तीन पग पृथ्वी माँगना, बलिका वचन देना और शुक्राचार्यजीका उन्हें रोकना
श्रीशुक उवाच
इति वैरोचनेर्वाक्यं धर्मयुक्तं ससूनृतम्।
निशम्य भगवान्प्रीतः प्रतिनन्द्येदमब्रवीत्॥ १
iti vairocanervākyaṃ dharmayuktaṃ sasūnṛtam|
niśamya bhagavānprītaḥ pratinandyedamabravīt|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजा बलिके ये वचन धर्मभावसे भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान् वामनने बड़ी प्रसन्नतासे उनका अभिनन्दन किया और कहा॥ १॥
इति वैरोचनेर्वाक्यं धर्मयुक्तं ससूनृतम्।
निशम्य भगवान्प्रीतः प्रतिनन्द्येदमब्रवीत्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजा बलिके ये वचन धर्मभावसे भरे और बड़े मधुर थे। उन्हें सुनकर भगवान् वामनने बड़ी प्रसन्नतासे उनका अभिनन्दन किया और कहा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 992) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/1/