॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.19.2
श्रीभगवानुवाच
वचस्तवैतज्जनदेव सूनृतं
कुलोचितं धर्मयुतं यशस्करम्।
यस्य प्रमाणं भृगवः साम्पराये
पितामहः कुलवृद्धः प्रशान्तः॥ २
vacastavaitajjanadeva sūnṛtaṃ
kulocitaṃ dharmayutaṃ yaśaskaram|
yasya pramāṇaṃ bhṛgavaḥ sāmparāye
pitāmahaḥ kulavṛddhaḥ praśāntaḥ|| 2
अर्थ
श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! आपने जो कुछ कहा, वह आपकी कुलपरम्पराके अनुरूप, धर्मभावसे परिपूर्ण, यशको बढ़ानेवाला और अत्यन्त मधुर है। क्यों न हो, परलोकहितकारी धर्मके सम्बन्धमें आप भृगुपुत्र शुक्राचार्यको परम प्रमाण जो मानते हैं। साथ ही अपने कुलवृद्ध पितामह परम शान्त प्रह्लादजीकी आज्ञा भी तो आप वैसे ही मानते हैं॥ २॥✎ 791