न ह्येतस्मिन्कुले कश्चिन्निःसत्त्वः कृपणः पुमान्।
प्रत्याख्याता प्रतिश्रुत्य यो वादाता द्विजातये॥ ३
na hyetasminkule kaścinniḥsattvaḥ kṛpaṇaḥ pumān|
pratyākhyātā pratiśrutya yo vādātā dvijātaye|| 3
अर्थ
आपकी वंशपरम्परामें कोई धैर्यहीन अथवा कृपण पुरुष कभी हुआ ही नहीं। ऐसा भी कोई नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मणको कभी दान न दिया हो अथवा जो एक बार किसीको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके बादमें मुकर गया हो॥ ३॥
न ह्येतस्मिन्कुले कश्चिन्निःसत्त्वः कृपणः पुमान्।
प्रत्याख्याता प्रतिश्रुत्य यो वादाता द्विजातये॥ ३
आपकी वंशपरम्परामें कोई धैर्यहीन अथवा कृपण पुरुष कभी हुआ ही नहीं। ऐसा भी कोई नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मणको कभी दान न दिया हो अथवा जो एक बार किसीको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके बादमें मुकर गया हो॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 993) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/3/