असुरशिरोमणे! जिस समय हिरण्यकशिपु उनपर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डरसे काँपते हुए विष्णुभगवान्ने अपने शरीरको सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणोंके द्वारा नासिकामेंसे होकर हृदयमें जा बैठे॥ १०॥✎ 792
एवं स निश्चित्य रिपोः शरीर-
माधावतो निर्विविशेऽसुरेन्द्र।
श्वासानिलान्तर्हितसूक्ष्मदेह-
स्तत्प्राणरन्ध्रेण विविग्नचेताः॥ १०
असुरशिरोमणे! जिस समय हिरण्यकशिपु उनपर झपट रहा था, उसी समय ऐसा निश्चय करके डरसे काँपते हुए विष्णुभगवान्ने अपने शरीरको सूक्ष्म बना लिया और उसके प्राणोंके द्वारा नासिकामेंसे होकर हृदयमें जा बैठे॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 993) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/19/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#792 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्ने