श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.9

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यतो यतोऽहं तत्रासौ मृत्युः प्राणभृतामिव।

अतोऽहमस्य हृदयं प्रवेक्ष्यामि पराग्दृशः॥ ९

yato yato'haṃ tatrāsau mṛtyuḥ prāṇabhṛtāmiva|

ato'hamasya hṛdayaṃ pravekṣyāmi parāgdṛśaḥ|| 9

अर्थ

‘जैसे संसारके प्राणियोंके पीछे मृत्यु लगी रहती है—वैसे ही मैं जहाँ-जहाँ जाऊँगा, वहीं-वहीं यह मेरा पीछा करेगा। इसलिये मैं इसके हृदयमें प्रवेश कर जाऊँ, जिससे यह मुझे देख न सके; क्योंकि यह तो बहिर्मुख है, बाहरकी वस्तुएँ ही देखता है॥ ९॥✎ 792

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #792 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् ने → विष्णुभगवान्‌ने

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