श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.19.17

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

नान्यत् ते कामये राजन्वदान्याज्जगदीश्‍वरात्।

नैनः प्राप्नोति वै विद्वान्यावदर्थप्रतिग्रहः॥ १७

nānyat te kāmaye rājanvadānyājjagadīśvarāt|

nainaḥ prāpnoti vai vidvānyāvadarthapratigrahaḥ|| 17

अर्थ

माना कि आप सारे जगत‍्के स्वामी और बड़े उदार हैं, फिर भी मैं आपसे इससे अधिक नहीं चाहता। विद्वान् पुरुषको केवल अपनी आवश्यकताके अनुसार ही दान स्वीकार करना चाहिये। इससे वह प्रतिग्रहजन्य पापसे बच जाता है॥ १७॥✎ 793

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #793 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णुभगवान् को → विष्णुभगवान्‌को

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