शुक्राचार्यजी सब कुछ जानते थे। उनसे भगवान्की यह लीला भी छिपी नहीं थी। उन्होंने राजा बलिको पृथ्वी देनेके लिये तैयार देखकर उनसे कहा॥ २९॥✎ 795796
विष्णवे क्ष्मां प्रदास्यन्तमुशना असुरेश्वरम्।
जानंश्चिकीर्षितं विष्णोः शिष्यं प्राह विदां वरः॥ २९
शुक्राचार्यजी सब कुछ जानते थे। उनसे भगवान्की यह लीला भी छिपी नहीं थी। उन्होंने राजा बलिको पृथ्वी देनेके लिये तैयार देखकर उनसे कहा॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.19.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 996) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/19/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)