श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.20.10

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

मनस्विनः कारुणिकस्य शोभनं

यदर्थिकामोपनयेन दुर्गतिः।

कुतः पुनर्ब्रह्मविदां भवादृशां

ततो वटोरस्य ददामि वाञ्छितम्॥ १०

manasvinaḥ kāruṇikasya śobhanaṃ

yadarthikāmopanayena durgatiḥ|

kutaḥ punarbrahmavidāṃ bhavādṛśāṃ

tato vaṭorasya dadāmi vāñchitam|| 10

अर्थ

गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचककी कामना पूर्ण करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभाकी बात होती है। फिर आप-जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषोंको दान करनेसे दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है। इसलिये मैं इस ब्रह्मचारीकी अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा॥ १०॥

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