tasmādasya vadho dharmo bhartuḥ śuśrūṣaṇaṃ ca naḥ|
ityāyudhāni jagṛhurbaleranucarāsurāḥ|| 13
अर्थ
ऐसी अवस्थामें हमलोगोंका यही धर्म है कि इस शत्रुको मार डालें। इससे हमारे स्वामी बलिकी सेवा भी होती है।’ यों सोचकर राजा बलिके अनुचर असुरोंने अपने-अपने हथियार उठा लिये॥ १३॥✎ 8091628
तस्मादस्य वधो धर्मो भर्तुः शुश्रूषणं च नः।
इत्यायुधानि जगृहुर्बलेरनुचरासुराः॥ १३
ऐसी अवस्थामें हमलोगोंका यही धर्म है कि इस शत्रुको मार डालें। इससे हमारे स्वामी बलिकी सेवा भी होती है।’ यों सोचकर राजा बलिके अनुचर असुरोंने अपने-अपने हथियार उठा लिये॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1004) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/8/21/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्को