श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.22

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

बलेन सचिवैर्बुद्ध्या दुर्गैर्मन्त्रौषधादिभिः।

सामादिभिरुपायैश्‍च कालं नात्येति वै जनः॥ २२

balena sacivairbuddhyā durgairmantrauṣadhādibhiḥ|

sāmādibhirupāyaiśca kālaṃ nātyeti vai janaḥ|| 22

अर्थ

बल, मन्त्री, बुद्धि, दुर्ग, मन्त्र, ओषधि और सामादि उपाय—इनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा अथवा सबके द्वारा मनुष्य कालपर विजय नहीं प्राप्त कर सकता॥ २२॥✎ 809 1628

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1628 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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