श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.23

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

भवद्भिर्निर्जिता ह्येते बहुशोऽनुचरा हरेः।

दैवेनर्द्धैस्त एवाद्य युधि जित्वा नदन्ति नः॥ २३

bhavadbhirnirjitā hyete bahuśo'nucarā hareḥ|

daivenarddhaista evādya yudhi jitvā nadanti naḥ|| 23

अर्थ

जब दैव तुमलोगोंके अनुकूल था, तब तुमलोगोंने भगवान्‌के इन पार्षदोंको कई बार जीत लिया था। पर देखो, आज वे ही युद्धमें हमपर विजय प्राप्त करके सिंहनाद कर रहे हैं॥ २३॥✎ 809 1628

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #809 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1628 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

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