श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.34

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

विप्रलब्धो ददामीति त्वयाहं चाढ्यमानिना।

तद् व्यलीकफलं भुङ्क्ष्व निरयं कतिचित् समाः॥ ३४✎ 1122

vipralabdho dadāmīti tvayāhaṃ cāḍhyamāninā|

tad vyalīkaphalaṃ bhuṅkṣva nirayaṃ katicit samāḥ|| 34

अर्थ

तुम्‍हें इस बातका बड़ा घमंड था कि मैं बड़ा धनी हूँ। तुमने मुझसे ‘दूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर धोखा दे दिया। अब तुम कुछ वर्षोंतक इस झूठका फल नरक भोगो’॥ ३४॥✎ 1846 1847

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामष्टमस्कन्धे वामनप्रादुर्भावे

बलिनिग्रहो नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1122 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): व्यलीकफल → व्यलीकफलं
  • #1846 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): घमंड → बड़ा घमंड
  • #1847 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): तुमसे → तुमने मुझसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें