tad vyalīkaphalaṃ bhuṅkṣva nirayaṃ katicit samāḥ|| 34
अर्थ
तुम्हें इस बातका बड़ा घमंड था कि मैं बड़ा धनी हूँ। तुमने मुझसे ‘दूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर धोखा दे दिया। अब तुम कुछ वर्षोंतक इस झूठका फल नरक भोगो’॥ ३४॥✎ 18461847
विप्रलब्धो ददामीति त्वयाहं चाढ्यमानिना।
तद् व्यलीकफलं भुङ्क्ष्व निरयं कतिचित् समाः॥ ३४
तुम्हें इस बातका बड़ा घमंड था कि मैं बड़ा धनी हूँ। तुमने मुझसे ‘दूँगा’—ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर धोखा दे दिया। अब तुम कुछ वर्षोंतक इस झूठका फल नरक भोगो’॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.21.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1006) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/21/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1122 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): व्यलीकफल → व्यलीकफलं
#1846 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): घमंड → बड़ा घमंड
#1847 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): तुमसे → तुमने मुझसे