श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तोयैः समर्हणैः स्रग्भिर्दिव्यगन्धानुलेपनैः।

धूपैर्दीपैः सुरभिभिर्लाजाक्षतफलाङ्कुरैः॥ ६

toyaiḥ samarhaṇaiḥ sragbhirdivyagandhānulepanaiḥ|

dhūpairdīpaiḥ surabhibhirlājākṣataphalāṅkuraiḥ|| 6

अर्थ

उन लोगोंने जल-उपहार, माला, दिव्य गन्धोंसे भरे अंगराग, सुगन्धित धूप, दीप, खील, अक्षत, फल, अंकुर, भगवान्‌की महिमा और प्रभावसे युक्त स्तोत्र, जयघोष, नृत्य, बाजे-गाजे, गान एवं शंख और दुन्दुभिके शब्दोंसे भगवान्‌की आराधना की॥ ६-७॥✎ 804 805 806 807 808

यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #804 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #805 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #806 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #807 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #808 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें