यह जीव अपने कर्मोंके कारण विवश होकर अनेक योनियोंमें भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपासे मनुष्यका शरीर प्राप्त करता है॥ २५॥✎ 816
यदा कदाचिज्जीवात्मा संसरन् निजकर्मभिः।
नानायोनिष्वनीशोऽयं पौरुषीं गतिमाव्रजेत्॥ २५
यह जीव अपने कर्मोंके कारण विवश होकर अनेक योनियोंमें भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपासे मनुष्यका शरीर प्राप्त करता है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.22.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1009) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/22/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#816 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने