॥ श्रीहरिः ॥
रक्षिष्ये सर्वतोऽहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम्।
सदा सन्निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान्॥ ३५
rakṣiṣye sarvato'haṃ tvāṃ sānugaṃ saparicchadam|
sadā sannihitaṃ vīra tatra māṃ drakṣyate bhavān|| 35
अर्थ
मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरोंकी और भोगसामग्रीकी भी सब प्रकारके विघ्नोंसे रक्षा करूँगा। वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे॥ ३५॥
रक्षिष्ये सर्वतोऽहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम्।
सदा सन्निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान्॥ ३५
मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरोंकी और भोगसामग्रीकी भी सब प्रकारके विघ्नोंसे रक्षा करूँगा। वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.22.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1010) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/22/35/