श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.35

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

रक्षिष्ये सर्वतोऽहं त्वां सानुगं सपरिच्छदम्।

सदा सन्‍निहितं वीर तत्र मां द्रक्ष्यते भवान्॥ ३५

rakṣiṣye sarvato'haṃ tvāṃ sānugaṃ saparicchadam|

sadā sannihitaṃ vīra tatra māṃ drakṣyate bhavān|| 35

अर्थ

मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरोंकी और भोगसामग्रीकी भी सब प्रकारके विघ्नोंसे रक्षा करूँगा। वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे॥ ३५॥

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