श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.22.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

यस्मिन् वैरानुबन्धेन रूढेन विबुधेतराः।

बहवो लेभिरे सिद्धिं यामु हैकान्तयोगिनः॥ ६

yasmin vairānubandhena rūḍhena vibudhetarāḥ|

bahavo lebhire siddhiṃ yāmu haikāntayoginaḥ|| 6

अर्थ

आपसे हमलोगोंका जो उपकार होता है, उसे मैं क्या बताऊँ? अनन्यभावसे योग करनेवाले योगीगण जो सिद्धि प्राप्त करते हैं, वही सिद्धि बहुत-से असुरोंको आपके साथ दृढ़ वैरभाव करनेसे ही प्राप्त हो गयी है॥ ६॥

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