yat tat karmasu vaiṣamyaṃ brahmadṛṣṭaṃ samaṃ bhavet|| 14
अर्थ
‘ब्रह्मन्! आपका शिष्य यज्ञ कर रहा था। उसमें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण कर दीजिये। क्योंकि कर्म करनेमें जो कुछ भूल-चूक हो जाती है, वह ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टिसे सुधर जाती है’॥ १४॥✎ 822
ब्रह्मन् संतनु शिष्यस्य कर्मच्छिद्रं वितन्वतः।
यत् तत् कर्मसु वैषम्यं ब्रह्मदृष्टं समं भवेत्॥ १४
‘ब्रह्मन्! आपका शिष्य यज्ञ कर रहा था। उसमें जो त्रुटि रह गयी है, उसे आप पूर्ण कर दीजिये। क्योंकि कर्म करनेमें जो कुछ भूल-चूक हो जाती है, वह ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टिसे सुधर जाती है’॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.23.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1012) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/23/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)