श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

सर्वमेतन्मयाऽऽख्यातं भवतः कुलनन्दन।

उरुक्रमस्य चरितं श्रोतॄणामघमोचनम्॥ २८

sarvametanmayā''khyātaṃ bhavataḥ kulanandana|

urukramasya caritaṃ śrotṝṇāmaghamocanam|| 28

अर्थ

परीक्षित्! तुम्हें मैंने भगवान्‌की यह सब लीला सुनायी। इससे सुननेवालोंके सारे पाप छूट जाते हैं॥ २८॥✎ 824 825 826 1629

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #824 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #825 शब्दोंके बीचका स्थान: वामनभगवान् को → वामनभगवान्‌को
  • #826 शब्दोंके बीचका स्थान: वामन-भगवान् को → वामन-भगवान्‌को
  • #1629 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वामन-भगवान्‌को → वामनभगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें