श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.23.29

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

पारं महिम्न उरु विक्रमतो गृणानो

यः पार्थिवानि विममे स रजांसि मर्त्यः।

किं जायमान उत जात उपैति मर्त्य

इत्याह मन्त्रदृगृषिः पुरुषस्य यस्य॥ २९

pāraṃ mahimna uru vikramato gṛṇāno

yaḥ pārthivāni vimame sa rajāṃsi martyaḥ|

kiṃ jāyamāna uta jāta upaiti martya

ityāha mantradṛgṛṣiḥ puruṣasya yasya|| 29

अर्थ

भगवान्‌की लीलाएँ अनन्त हैं, उनकी महिमा अपार है। जो मनुष्य उसका पार पाना चाहता है वह मानो पृथ्वीके परमाणुओंको गिन डालना चाहता है। भगवान्‌के सम्बन्धमें मन्त्रद्रष्टा महर्षि वसिष्ठने वेदोंमें कहा है कि ‘ऐसा पुरुष न कभी हुआ, न है और न होगा जो भगवान्‌की महिमाका पार पा सके’॥ २९॥✎ 827 828

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #827 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #828 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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