राजा सत्यव्रतको इस बातका पता नहीं था कि स्वयं भगवान् मुझपर प्रसन्न होकर कृपा करनेके लिये मछलीके रूपमें पधारे हैं। इसलिये उन्होंने उस मछलीकी रक्षाका मन-ही-मन संकल्प किया॥ १५॥
तमात्मनोऽनुग्रहार्थं प्रीत्या मत्स्यवपुर्धरम्।
अजानन् रक्षणार्थाय शफर्याः स मनो दधे॥ १५
राजा सत्यव्रतको इस बातका पता नहीं था कि स्वयं भगवान् मुझपर प्रसन्न होकर कृपा करनेके लिये मछलीके रूपमें पधारे हैं। इसलिये उन्होंने उस मछलीकी रक्षाका मन-ही-मन संकल्प किया॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1016) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/24/15/