और कहा—‘राजन्! मैं जलचर प्राणी हूँ। इस सरोवरका जल भी मेरे सुखपूर्वक रहनेके लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये आप मेरी रक्षा कीजिये और मुझे किसी अगाध सरोवरमें रख दीजिये,॥ २२॥✎ 8332038
नैतन्मे स्वस्तये राजन्नुदकं सलिलौकसः।
निधेहि रक्षायोगेन ह्रदे मामविदासिनि॥ २२
और कहा—‘राजन्! मैं जलचर प्राणी हूँ। इस सरोवरका जल भी मेरे सुखपूर्वक रहनेके लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये आप मेरी रक्षा कीजिये और मुझे किसी अगाध सरोवरमें रख दीजिये,॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1016) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/24/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#833 शब्दोंके बीचका स्थान: मत्स्यभगवान् ने → मत्स्यभगवान्ने