श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

नमस्ते पुरुषश्रेष्ठ स्थित्युत्पत्त्यप्ययेश्‍वर।✎ 966

भक्तानां नः प्रपन्‍नानां मुख्यो ह्यात्मगतिर्विभो॥ २८

namaste puruṣaśreṣṭha sthityutpattyapyayeśvara|

bhaktānāṃ naḥ prapannānāṃ mukhyo hyātmagatirvibho|| 28

अर्थ

पुरुषोत्तम! आप जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्वामी हैं। आपको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रभो! हम शरणागत भक्तोंके लिये आप ही आत्मा और आश्रय हैं॥ २८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #966 शब्दोंके बीचका स्थान: नमस्तेपुरुषश्रेष्ठ → नमस्ते पुरुषश्रेष्ठ

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