॥ श्रीहरिः ॥
आस्तीर्य दर्भान् प्राक्कूलान् राजर्षिः प्रागुदङ्मुखः।
निषसाद हरेः पादौ चिन्तयन् मत्स्यरूपिणः॥ ४०
āstīrya darbhān prākkūlān rājarṣiḥ prāgudaṅmukhaḥ|
niṣasāda hareḥ pādau cintayan matsyarūpiṇaḥ|| 40
अर्थ
कुशोंका अग्रभाग पूर्वकी ओर करके राजर्षि सत्यव्रत उनपर पूर्वोत्तर मुखसे बैठ गये और मत्स्यरूप भगवान्के चरणोंका चिन्तन करने लगे॥ ४०॥✎ 837
आस्तीर्य दर्भान् प्राक्कूलान् राजर्षिः प्रागुदङ्मुखः।
निषसाद हरेः पादौ चिन्तयन् मत्स्यरूपिणः॥ ४०
कुशोंका अग्रभाग पूर्वकी ओर करके राजर्षि सत्यव्रत उनपर पूर्वोत्तर मुखसे बैठ गये और मत्स्यरूप भगवान्के चरणोंका चिन्तन करने लगे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.24.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 1018) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/24/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #837 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने