श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.45

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

निबध्य नावं तच्छृङ्गे यथोक्तो हरिणा पुरा।

वरत्रेणाहिना तुष्टस्तुष्टाव मधुसूदनम्॥ ४५

nibadhya nāvaṃ tacchṛṅge yathokto hariṇā purā|

varatreṇāhinā tuṣṭastuṣṭāva madhusūdanam|| 45

अर्थ

भगवान्‌ने पहले जैसी आज्ञा दी थी, उसके अनुसार वह नौका वासुकिनागके द्वारा भगवान्‌के सींगमें बाँध दी गयी और राजा सत्यव्रतने प्रसन्‍न होकर भगवान्‌की स्तुति की॥ ४५॥✎ 839 840 841

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #839 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #840 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #841 शब्दोंके बीचका स्थान: ध्यानकिया। → ध्यान किया।

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