श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.11

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता।

नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥ ११

sattvena pratilabhyāya naiṣkarmyeṇa vipaścitā|

namaḥ kaivalyanāthāya nirvāṇasukhasaṃvide|| 11

अर्थ

विवेकी पुरुष कर्म-संन्यास अथवा कर्म-समर्पणके द्वारा अपना अन्तःकरण शुद्ध करके जिन्हें प्राप्त करते हैं तथा जो स्वयं तो नित्यमुक्त, परमानन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं ही, दूसरोंको कैवल्य-मुक्ति देनेकी सामर्थ्य भी केवल उन्हींमें है—उन प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ॥ ११॥

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