॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.3.12
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥ १२
namaḥ śāntāya ghorāya mūḍhāya guṇadharmiṇe|
nirviśeṣāya sāmyāya namo jñānaghanāya ca|| 12
अर्थ
जो सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंका धर्म स्वीकार करके क्रमशः शान्त, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारण करते हैं, उन भेदरहित समभावसे स्थित एवं ज्ञानघन प्रभुको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ १२॥