श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.13

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे।

पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः॥ १३

kṣetrajñāya namastubhyaṃ sarvādhyakṣāya sākṣiṇe|

puruṣāyātmamūlāya mūlaprakṛtaye namaḥ|| 13

अर्थ

आप सबके स्वामी, समस्त क्षेत्रोंके एकमात्र ज्ञाता एवं सर्वसाक्षी हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ। आप स्वयं ही अपने कारण हैं। पुरुष और मूल प्रकृतिके रूपमें भी आप ही हैं। आपको मेरा बार-बार नमस्कार॥ १३॥

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