श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.6

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-

र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम्।

यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो

दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥ ६

na yasya devā ṛṣayaḥ padaṃ vidu-

rjantuḥ punaḥ ko'rhati gantumīritum|

yathā naṭasyākṛtibhirviceṣṭato

duratyayānukramaṇaḥ sa māvatu|| 6

अर्थ

उनकी लीलाओंका रहस्य जानना बहुत ही कठिन है। वे नटकी भाँति अनेकों वेष धारण करते हैं। उनके वास्तविक स्वरूपको न तो देवता जानते हैं और न ऋषि ही; फिर दूसरा ऐसा कौन प्राणी है जो वहाँतक जा सके और उसका वर्णन कर सके? वे प्रभु मेरी रक्षा करें॥ ६॥✎ 661 662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #661 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #662 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें