श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.3.7

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं

विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः।

चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने

भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः॥ ७

didṛkṣavo yasya padaṃ sumaṅgalaṃ

vimuktasaṅgā munayaḥ susādhavaḥ|

carantyalokavratamavraṇaṃ vane

bhūtātmabhūtāḥ suhṛdaḥ sa me gatiḥ|| 7

अर्थ

जिनके परम मंगलमय स्वरूपका दर्शन करनेके लिये महात्मागण संसारकी समस्त आसक्तियोंका परित्याग कर देते हैं और वनमें जाकर अखण्डभावसे ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतोंका पालन करते हैं तथा अपने आत्माको सबके हृदयमें विराजमान देखकर स्वाभाविक ही सबकी भलाई करते हैं—वे ही मुनियोंके सर्वस्व भगवान् मेरे सहायक हैं; वे ही मेरी गति हैं॥ ७॥✎ 661 662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #661 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #662 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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