श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.3

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्‍चर्यरूपधृक्।

मुक्तो देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः॥ ३

yo'sau grāhaḥ sa vai sadyaḥ paramāścaryarūpadhṛk|

mukto devalaśāpena hūhūrgandharvasattamaḥ|| 3

अर्थ

इधर वह ग्राह तुरंत ही परम आश्‍चर्यमय दिव्य शरीरसे सम्पन्‍न हो गया। यह ग्राह इसके पहले ‘हूहू’ नामका एक श्रेष्ठ गन्धर्व था। देवलके शापसे उसे यह गति प्राप्त हुई थी। अब भगवान्‌की कृपासे वह मुक्त हो गया॥ ३॥✎ 669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #669 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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