श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.4.4

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

प्रणम्य शिरसाधीशमुत्तमश्लोकमव्ययम्।

अगायत यशोधाम कीर्तन्यगुणसत्कथम्॥ ४

praṇamya śirasādhīśamuttamaślokamavyayam|

agāyata yaśodhāma kīrtanyaguṇasatkatham|| 4

अर्थ

उसने सर्वेश्‍वर भगवान्‌के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया, इसके बाद वह भगवान्‌के सुयशका गान करने लगा। वास्तवमें अविनाशी भगवान् ही सर्वश्रेष्ठ कीर्तिसे सम्पन्‍न हैं। उन्हींके गुण और मनोहर लीलाएँ गान करनेयोग्य हैं॥ ४॥

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